वो लड़की भी आईं नहीं हमें बचाने के लिए..बहुत से लोग आते हैं मुझे बुझाने के लिए

 

वो लड़की भी आईं नहीं हमें बचाने के लिए 

बहुत से लोग आते हैं मुझे बुझाने के लिए

ऐ खुदा मेरे मज़ार पर हजार दीए जलें 

फिर एक हाथ भी मयस्सर न हो मुझे बुझाने के लिए 

यादों में डूब या शराबों में डूब या अपने आंसूओं में डूब 

मगर ग़म न कर अभी और भी दिन हैं झेलने के लिए

वो लड़की जो कहती थी आप बहुत अच्छे हैं

आज उसके ही दिल में जगह नहीं उतरने के लिए

एक चाय की तस्वीर से मेंहदी की महक आती है

जब भी दुश्मन आते हैं मुझे ज़हर पिलाने के लिए 

ये दिवाली ये पर्वो त्यौहार न जाने हमारे किस काम के

न वो आती है और न हम जबरदस्ती जा सकते उसे बुलाने के लिए...

© आशु चौधरी "आशुतोष 

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