कैसे हो, तुम तो यहाँ के हो ही नहीं ऐसे हो
कभी छांव तो कभी धूप जैसे हो
वो जो दुश्मन था मेरे जान का
वो जो दोस्त था मेरे पहचान का
वो जिंदगी जो कभी था न मेरे काम का
वो मंजिल जो कभी था न मेरे मुकाम का
लोग कहते हैं सब बदल गये
मगर 'आशु' तुम बिल्कुल वैसे हो
कभी छांव तो कभी धूप जैसे हो ।
©आशु चौधरी ''आशुतोष
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