खुद को अच्छा साबित करते हुए
हम रो पड़े थे उसको याद करते हुए
ज़हर सी थी जिंदगी
अमृत सा था उसका फसाना
बेबसी में ज़हर खाते हुए
हम रो पड़े थे मरते हुए ।
© आशु चौधरी "आशुतोष
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