सौ बार मर चुका हूँ उस ख्वाब में
जिस ख्वाब में वो मुझसे बिछड़ती रही
तब से और आज तक....
अपनी और वजूद के बीच नहीं बनी।
© आशु चौधरी "आशुतोष
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें